बेलौस परिंदे उड़ा नहीं करते आसमान में,
दरख्तों के सायों की अब ख्वाहिश ही कहाँ इंसान में।
बेखबर लगता है जमाना हमारी अज्म़ से,
मुट्ठी में भर लें सारा आसमान;वो हौसला है हमारी उड़ान में ।
न जाने क्यों डर लगता है लोगों को अकेलेपन से,
हमें तो मतलब ही नहीं किसी से जान-पहचान में ।
दुश्मन मुल्क हमें आंख दिखाए और हम चुप रहें,
इतनी भी खातिरदारी नहीं हिन्दुस्तान में।
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