खुद को बदल दिया इतना, अब गुंजाइश रही नहीं
जीभर गया खुद से, अब कोई फरमाइश रही नहीं
छोड़ दिया है उसने इंतजार करना, अब घर
जाने की जल्दी रही नहीं
कल की फिक्र में ये रात भी गुजर गई
अब उसकी हां में हां मिलाने की आदत रही नहीं
-रामराज मिश्रा 'राज'