विज्ञापन

“तुम्हें हार जाना चाहती हूँ” - रक्षित मिश्रा

Rakshit Mishra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हम कुछ घण्टे गँवा देंगे
        
                                                    
                            
अगर मैं तुम्हारी शिकायत करने पर आऊँ
हम खो बैठेंगे वो ज़ायका
जिसके लिए हम मिला करते हैं
अब तुम मेरी ज़रा भी परवाह नहीं करते
सब पता होता है मुझे
ये सारी ग़लतियाँ तुमसे ग़लती से नहीं होतीं
तुम्हें हर बार यही करना होता है
जानबूझकर वादे से मुकरना होता है
ये सितम एहसान की तरह किए जाते हो
मैं मर रही हूँ तुम हँसकर जिए जाते हो

मैं कोशिश कर रही हूँ
लगभग टूट चुके एक रिश्ते को जोड़ने की
लगी हूँ एक हारी हुई बाज़ी जीतने में
व्यस्त हूँ तुम्हें पाने की तरकीब सोचने में
पर अक्सर मेरा कलेजा बैठ जाता है
अब मुझमें बहुत कम हिम्मत शेष है
लगता है कि अगर मैं जीत भी गई
तो शायद मुझमें सामर्थ्य न रह जाए
उस ख़ुशी को महसूस करने की
जिसके लिए मैं प्रत्येक पल प्रयत्नशील हूँ

कभी कभी तो मुझे लगता है कि
शायद मैं अब तुम्हें हार जाना चाहती हूँ
तुम्हें मनाते-मनाते मैं ख़ुद रूठ चुकी हूँ
रिश्ते को जोड़ते-जोड़ते टूट चुकी हूँ
अब मैं इस उदासी का आनन्द लेने लगी हूँ
जो सुख मुझे तुम्हारी उपस्थिति देती है
अब वो मुझे आकर्षित नहीं करता
इंतज़ार ने इस क़दर तोड़ दिया है
कि मैंने अब इंतज़ार करना ही छोड़ दिया है

मैं तुम्हें हार जाना चाहती हूँ
क्यूँकि अब तुम बहुत मामूली हो गए हो
मुझे तुम्हारा यह रूप दोहरा दुःख देता है
पहला दुःख कि तुम मेरे नहीं रहे
दूसरा कि मैं भी अब तुम्हारी नहीं रही
अपने दिल की डोर मैंने तुम्हारे हाथों में दी थी
और वो डोर तुम छोड़ चुके हो
~ रक्षित मिश्रा
2 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all