हम कुछ घण्टे गँवा देंगे
अगर मैं तुम्हारी शिकायत करने पर आऊँ
हम खो बैठेंगे वो ज़ायका
जिसके लिए हम मिला करते हैं
अब तुम मेरी ज़रा भी परवाह नहीं करते
सब पता होता है मुझे
ये सारी ग़लतियाँ तुमसे ग़लती से नहीं होतीं
तुम्हें हर बार यही करना होता है
जानबूझकर वादे से मुकरना होता है
ये सितम एहसान की तरह किए जाते हो
मैं मर रही हूँ तुम हँसकर जिए जाते हो
मैं कोशिश कर रही हूँ
लगभग टूट चुके एक रिश्ते को जोड़ने की
लगी हूँ एक हारी हुई बाज़ी जीतने में
व्यस्त हूँ तुम्हें पाने की तरकीब सोचने में
पर अक्सर मेरा कलेजा बैठ जाता है
अब मुझमें बहुत कम हिम्मत शेष है
लगता है कि अगर मैं जीत भी गई
तो शायद मुझमें सामर्थ्य न रह जाए
उस ख़ुशी को महसूस करने की
जिसके लिए मैं प्रत्येक पल प्रयत्नशील हूँ
कभी कभी तो मुझे लगता है कि
शायद मैं अब तुम्हें हार जाना चाहती हूँ
तुम्हें मनाते-मनाते मैं ख़ुद रूठ चुकी हूँ
रिश्ते को जोड़ते-जोड़ते टूट चुकी हूँ
अब मैं इस उदासी का आनन्द लेने लगी हूँ
जो सुख मुझे तुम्हारी उपस्थिति देती है
अब वो मुझे आकर्षित नहीं करता
इंतज़ार ने इस क़दर तोड़ दिया है
कि मैंने अब इंतज़ार करना ही छोड़ दिया है
मैं तुम्हें हार जाना चाहती हूँ
क्यूँकि अब तुम बहुत मामूली हो गए हो
मुझे तुम्हारा यह रूप दोहरा दुःख देता है
पहला दुःख कि तुम मेरे नहीं रहे
दूसरा कि मैं भी अब तुम्हारी नहीं रही
अपने दिल की डोर मैंने तुम्हारे हाथों में दी थी
और वो डोर तुम छोड़ चुके हो
~ रक्षित मिश्रा
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