विज्ञापन

खड़ी-खड़ी बस इंतज़ार न करती

Rakesh Ranjan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आज ज़रा जो हम यूँ सरपट न चलते,
        
                                                    
                            
रफ़्तार में थोड़ी और फुर्ती न भरते,
तो खड़ी-खड़ी बस इंतज़ार न करती,
छोड़ हमें पीछे, यूँ ही आगे निकल पड़ती।

रोज़ की ये आदत हमें लाचार करती,
भागमभाग ज़िंदगी की हर सुबह आ घेरती।
"आज का काम, कल का इरादा" के जाल में,
फँसे हैं हम सब ऑफिस के इस जंजाल में।

बस एक वही तो है जो थोड़ी वफ़ा करती,
शायद इतना लगाव न होता अगर मुझ पर—
तो खड़ी-खड़ी बस इंतज़ार न करती,
छोड़ हमें पीछे, यूँ ही आगे निकल पड़ती!

 
13 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Updesh Kumar

12614 कविताएं

View Profile

Nathuram Kaswan

8654 कविताएं

View Profile

User

30 कविताएं

View Profile