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खड़ी-खड़ी बस इंतज़ार न करती

Rakesh Ranjan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आज ज़रा जो हम यूँ सरपट न चलते,
        
                                                    
                            
रफ़्तार में थोड़ी और फुर्ती न भरते,
तो खड़ी-खड़ी बस इंतज़ार न करती,
छोड़ हमें पीछे, यूँ ही आगे निकल पड़ती।

रोज़ की ये आदत हमें लाचार करती,
भागमभाग ज़िंदगी की हर सुबह आ घेरती।
"आज का काम, कल का इरादा" के जाल में,
फँसे हैं हम सब ऑफिस के इस जंजाल में।

बस एक वही तो है जो थोड़ी वफ़ा करती,
शायद इतना लगाव न होता अगर मुझ पर—
तो खड़ी-खड़ी बस इंतज़ार न करती,
छोड़ हमें पीछे, यूँ ही आगे निकल पड़ती!

 
एक महीने पहले
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