आज ज़रा जो हम यूँ सरपट न चलते,
रफ़्तार में थोड़ी और फुर्ती न भरते,
तो खड़ी-खड़ी बस इंतज़ार न करती,
छोड़ हमें पीछे, यूँ ही आगे निकल पड़ती।
रोज़ की ये आदत हमें लाचार करती,
भागमभाग ज़िंदगी की हर सुबह आ घेरती।
"आज का काम, कल का इरादा" के जाल में,
फँसे हैं हम सब ऑफिस के इस जंजाल में।
बस एक वही तो है जो थोड़ी वफ़ा करती,
शायद इतना लगाव न होता अगर मुझ पर—
तो खड़ी-खड़ी बस इंतज़ार न करती,
छोड़ हमें पीछे, यूँ ही आगे निकल पड़ती!
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X