फैली हुई है विश्व में, रंगीन इक घटा।
हर सभ्यता में नूर है, फागुन की ज्यूं छटा।
परिधान हैं सुहावने, चहरे भी खुशनुमा।
अपनी सभी की मस्तियां, अपना ही है समा।
सब गीत प्रीत नेह के गाए हैं झूम कर।
आनंद-भाव रूह तक पाए हैं झूम कर।
मुद्रायें नृत्य भाव की हैं एक सी लगें।
दीपक दिलों में प्यार के हैं एक से जलें।
दिल से मिले है जिंदगी आंखों से भी मिले।
गुल प्रीत हुस्नो-इश्क के हर ओर हैं खिले।
- राकेश मल्होत्रा नुदरत