आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

हर सभ्यता में नूर है

                
                                                         
                            फैली हुई है विश्व में, रंगीन इक घटा।
                                                                 
                            
हर सभ्यता में नूर है, फागुन की ज्यूं छटा।

परिधान हैं सुहावने, चहरे भी खुशनुमा।
अपनी सभी की मस्तियां, अपना ही है समा।

सब गीत प्रीत नेह के गाए हैं झूम कर।
आनंद-भाव रूह तक पाए हैं झूम कर।

मुद्रायें नृत्य भाव की हैं एक सी लगें।
दीपक दिलों में प्यार के हैं एक से जलें।

दिल से मिले है जिंदगी आंखों से भी मिले।
गुल प्रीत हुस्नो-इश्क के हर ओर हैं खिले।
- राकेश मल्होत्रा नुदरत 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
33 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर