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शबो-गम में हमारी ज़िन्दगी यूँ ही गुजर जाती

राकेश भ्रमर

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अगर तुम साथ होती तो सफ़र लम्बा नहीं होता.
        
                                                    
                            
किसी भी ठाँव सर पे धूप का कतरा नहीं होता.

हवाओं की तरह आती, फ़जाएँ भी महक जातीं,
घटाओं की तरह आती, कहीं सहरा नहीं होता.

तुम्हारी याद के डेरे उजड़कर रह गए होते,
अगर ये कारवाँ मेरे लिए ठहरा नहीं होता.

शमा गर जल रही है तो तुम्हारी अंजुमन होगी,
वगरना इस तरह कोई यहाँ ठहरा नहीं होता.

शबो-गम में हमारी ज़िन्दगी यूँ ही गुजर जाती,
भटककर चाँद आँगन में अगर उतरा नहीं होता.
-राकेश भ्रमर
एक घंटा पहले
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