वह पुराना जमाना कहाँ खो गया
जिन्दगी का ठिकाना कहाँ खो गया।
आ के इन राजमहलों के आगोश में,
वो मेरा आशियाना कहाँ खो गया।
दब रही हर हँसी क्यों घुटन के तले,
खुल के हंसना-हंसाना कहाँ खो गया।
हर गली हर डगर नफरतों का जहर,
प्यार का आबोदाना कहाँ खो गया।
बोलियों में चुभन गोलियों की तरह,
चाहतों का तराना कहां खो गया।
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