Urdu Poetry: पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है
अपने ही घर में किसी दूसरे घर के हम हैं
- निदा फ़ाज़ली

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जो पूरे होने से रह गए थे वो ख़्वाब रक्खे हुए हैं घर में
यक़ीन मानो पुरानी रुत के गुलाब रक्खे हुए हैं घर में
- मोहम्मद मुबशशिर मेयो

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शोर दिन को नहीं सोने देता
शब को सन्नाटा जगा देता है
- सैफ़ुद्दीन सैफ़

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हिचकियाँ रात दर्द तन्हाई
आ भी जाओ तसल्लियाँ दे दो
- नासिर जौनपुरी

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इक मुद्दत का प्यासा ये कैसे समझे
दरिया के आगे भी रस्ता जाता है
- दीपेश शर्मा सौभरि

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दौलत से कहाँ जुड़ते हैं टूटे हुए रिश्ते
शीशे को कभी गोंद से जोड़ा नहीं जाता
- मेहवर नूरी

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Urdu Poetry: दिल ये इंसान का हर चीज़ से भर जाता है

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