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हम इसके पीछे और यह दो क़दम आगे होती है.

Rajiv Tyagi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            यह जो ज़िन्दगी है ना -
        
                                                    
                            
मौसम कैसा भी हो अक्सर तपा देती है,
पपड़ाते होठों को भी मुस्कुराहट और,
महंगे चश्मों के पीछे छिपी आंखों को नमीं देती है,
भूखे को कड़ी भूख और भरे पेट रोटी ढ़ेर देती है,
कहीं उतरन पहन कर है बेहद ख़ुश,
कभी भरी अलमारी भी नऐ कपड़ों को रोती है,
यह जो ज़िंदगी है ना -
हम इसके पीछे और यह दो क़दम आगे होती है.

 
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