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बरसात की बूंदें

Rajiv Tyagi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बरसते मौसम की लरज़ती बूंद ही
        
                                                    
                            
दरिया हो उमड़ती है,
रोके नहीं रुकती किसी हाल जब
किनारों से छलकती है,
बांध कितने ही ऊंचे, बड़े, कच्चे या
पक्के बना ले ए ग़ाफ़िल,
बहा ले जाती है समूची सल्तनत को,
गर बूंद आंख से ढ़लकती है.

 
5 घंटे पहले
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