बरसते मौसम की लरज़ती बूंद ही
दरिया हो उमड़ती है,
रोके नहीं रुकती किसी हाल जब
किनारों से छलकती है,
बांध कितने ही ऊंचे, बड़े, कच्चे या
पक्के बना ले ए ग़ाफ़िल,
बहा ले जाती है समूची सल्तनत को,
गर बूंद आंख से ढ़लकती है.