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बरसात की बूंदें

                
                                                         
                            बरसते मौसम की लरज़ती बूंद ही
                                                                 
                            
दरिया हो उमड़ती है,
रोके नहीं रुकती किसी हाल जब
किनारों से छलकती है,
बांध कितने ही ऊंचे, बड़े, कच्चे या
पक्के बना ले ए ग़ाफ़िल,
बहा ले जाती है समूची सल्तनत को,
गर बूंद आंख से ढ़लकती है.

 
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16 minutes ago

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