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फिर आशीष बन जाता है।

Rajeshwari Joshi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मेरे अल्फाज
        
                                                    
                            

माँ
और हम—
जीवन की दूर-दूर तक जाती राहों में
अपने नाम, अपनी पहचान, अपनी जीत
ढूँढ़ते रहे।

बहुत कुछ पाया,
बहुत कुछ बन गए,
बहुतों ने हमारा नाम लिया—
पर जब कभी भीतर की ओर लौटकर देखा,
तो हर उपलब्धि की जड़ में
एक चेहरा चुपचाप खड़ा मिला।

वही चेहरा,
जिसने हमारी पहली आहट पर
अपनी नींद छोड़ दी थी,
हमारी पहली चोट पर
अपना दर्द भुला दिया था,
और हमारी हर उड़ान के लिए
अपने आकाश का विस्तार
कम कर लिया था।

तब समझ आया—
हम अपने पैरों पर
कभी अकेले खड़े नहीं हुए।

हमारे भीतर जो साहस है,
उसमें उसकी प्रार्थनाओं की ऊष्मा है;
हमारी आँखों में जो उजाला है,
उसमें उसकी जागी हुई रातें हैं;
हमारी आवाज़ में जो विश्वास है,
उसमें उसके अनगिनत मौन हैं।

और सबसे बड़ा सत्य यह—
जिसे हम जीवन भर
अपनी उपलब्धि समझते रहे,
वह दरअसल
किसी माँ का
धीरे-धीरे अपने को मिटाकर
हमें आकार देना था।

अब उसके हाथों की झुर्रियाँ
सिर्फ उम्र की रेखाएँ नहीं लगतीं—
वे हमारी पूरी कहानी हैं।

काश,
हम उसके जीवन की किताब का
एक पन्ना भी
उतनी ही श्रद्धा से पढ़ पाते,
जितनी श्रद्धा से उसने
हमारी अधूरी कहानी को
पूरी उम्र पढ़ा है।

माँ से बड़ा
कोई शब्द नहीं मिला मुझे—
क्योंकि जहाँ सारे शब्द
समाप्त हो जाते हैं,
वहीं से
माँ का अर्थ शुरू होता है।

और शायद इसी कारण
ईश्वर की बनाई इस दुनिया में
सबसे सुंदर प्रार्थना
मंदिरों में नहीं मिलती—

वह मिलती है
उस झुके हुए माथे पर,
जो अपनी संतान के लिए
हर बार उठकर
फिर आशीष बन जाता है।

माँ—
वह ऋण है
जिसे चुकाने के लिए
मनुष्य को
एक जीवन नहीं,
पूरी संवेदना भी कम पड़ जाती है।
-राजेश्वरी पंत जोशी
 
एक दिन पहले
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