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उम्मीदों के ख़त

Rajesh Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            उम्मीदों में लिखे ख़त ख़ाली रह गए,
        
                                                    
                            
बहते हुए दरिया सूखे ही बह गए।

आँख तो लगी, पर नींद न आई,
हम सोए तो फिर सोए ही रह गए।

जिस्म की मैल को मल-मलकर धोया,
दरिया में रहते मगर मैले ही रह गए।

धरती से जुड़कर देखा हमने,
मन के परिंदे फिर भी हवा में ही रह गए।

उसने मन के अंदर तक झाँका,
पर दिल के ज़ख़्म रूखे ही रह गए।

उम्र भर खाकर भी मन न भर पाया,
हम जन्मों के भूखे, भूखे ही रह गए।

किसको सुनाएँ अब इस दिल का हाल,
एक बार जो टूटे तो टूटे ही रह गए।

उम्मीदों के दीये तो हमने बहुत जलाए,
पर राहों में अँधेरे ही पसरे रह गए।

वो चल दिए अपने सफ़र की राह पर,
हम मोड़ पर तन्हा खड़े ही रह गए।

बनाए थे जो महल कभी पक्के संगमरमर के,
वो फिसलकर रेत की तरह ढह गए।

'अगस्त्य' दर्दों की इस गहरी छाँव तले,
हम जितने अकेले थे, उतने ही रह गए।
-राजेश शर्मा 'अगस्त्य'
 
एक महीने पहले
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