आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

उम्मीदों के ख़त

                
                                                         
                            उम्मीदों में लिखे ख़त ख़ाली रह गए,
                                                                 
                            
बहते हुए दरिया सूखे ही बह गए।

आँख तो लगी, पर नींद न आई,
हम सोए तो फिर सोए ही रह गए।

जिस्म की मैल को मल-मलकर धोया,
दरिया में रहते मगर मैले ही रह गए।

धरती से जुड़कर देखा हमने,
मन के परिंदे फिर भी हवा में ही रह गए।

उसने मन के अंदर तक झाँका,
पर दिल के ज़ख़्म रूखे ही रह गए।

उम्र भर खाकर भी मन न भर पाया,
हम जन्मों के भूखे, भूखे ही रह गए।

किसको सुनाएँ अब इस दिल का हाल,
एक बार जो टूटे तो टूटे ही रह गए।

उम्मीदों के दीये तो हमने बहुत जलाए,
पर राहों में अँधेरे ही पसरे रह गए।

वो चल दिए अपने सफ़र की राह पर,
हम मोड़ पर तन्हा खड़े ही रह गए।

बनाए थे जो महल कभी पक्के संगमरमर के,
वो फिसलकर रेत की तरह ढह गए।

'अगस्त्य' दर्दों की इस गहरी छाँव तले,
हम जितने अकेले थे, उतने ही रह गए।
-राजेश शर्मा 'अगस्त्य'
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर