विज्ञापन

भवसागर से पार

Rajesh Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हम कश्ती हो जाएँ या बन जाएँ पतवार,
        
                                                    
                            
हम होना चाहते हैं इस भवसागर से पार।

जो गुज़र रही है, वो तो गुज़र ही जाएगी,
यह वक़्त का बहाव है, न करता कोई उधार।

जीना नहीं आसान, पर मरकर किसने क्या देखा?
यह उरला किनारा कभी मिल न सका उस पार।

कुछ डूब गए इस भँवर में फँसने से पहले ही,
कितना रहस्यमयी है, भवसागर का यह संसार!

न तैराक कुछ बता पाया, न अनाड़ी जान पाया,
यह कश्ती, पतवार, सब बेमतलब व्यापार!

जाना तो पड़ेगा ही, ‘अगस्त्य’, सबको रहेगा इंतज़ार,
झूठे मायाजाल का मोह छोड़, पहुँचेंगे उस सत्य के द्वार।
-राजेश शर्मा 'अगस्त्य'
 
9 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Ankit Kumar

10489 कविताएं

View Profile