हम कश्ती हो जाएँ या बन जाएँ पतवार,
हम होना चाहते हैं इस भवसागर से पार।
जो गुज़र रही है, वो तो गुज़र ही जाएगी,
यह वक़्त का बहाव है, न करता कोई उधार।
जीना नहीं आसान, पर मरकर किसने क्या देखा?
यह उरला किनारा कभी मिल न सका उस पार।
कुछ डूब गए इस भँवर में फँसने से पहले ही,
कितना रहस्यमयी है, भवसागर का यह संसार!
न तैराक कुछ बता पाया, न अनाड़ी जान पाया,
यह कश्ती, पतवार, सब बेमतलब व्यापार!
जाना तो पड़ेगा ही, ‘अगस्त्य’, सबको रहेगा इंतज़ार,
झूठे मायाजाल का मोह छोड़, पहुँचेंगे उस सत्य के द्वार।
-राजेश शर्मा 'अगस्त्य'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X