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परिंदे का घोंसला

Rajesh Ranjan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            उड़ गया था वो परिंदा घोंसले से
        
                                                    
                            
कर बैठा आसमान से मोहब्बत
लौटा था थककर घोंसले में फिर से
लेकिन वो अब पहले जैसा न था
याद आती थी उसे अब भी
वो आसमान की ऊंचाई
वो उन्मुक्त उड़ान
कैदखाना लगता था अब घोंसला
भूल गया था उड़ने से पहले
थकने के बाद
यही घोंसला आराम देता है
उम्र बीती तो परिंदे ने जाना
घोंसला कैद नहीं
जन्नत है जमीं पर...
इंसानी फितरत भी कुछ ऐसी ही है
उड़ो 'रंजन', मगर याद रहे
घोंसले बिना जीवन नहीं...
- राजेश रंजन सिंह
3 घंटे पहले
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