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जीवन की सच्चाई

Rajesh Patidar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अभी तो तन ही नाचा, मन मोर बाकि था
        
                                                    
                            
नई उल्लास नया सबेरा नया जीवन था
शून्य से यौवन तक का सफर खुशियो का अफसाना था |

इन्ही क्षणों मे कुछ कर गुजरने का जज़्बा था
और सपनों को मुट्ठी में भरने का ईरादा था
औरों की नसीहत ना सुनना, मन का राजा था |

हो गयी जब उम्र जिम्मेदारियाँ उठाने की
तो बदल गयी जीवन की परिभाषा भी |
जब पिता बनकर फर्ज़ निभाया तो
पिताजी की छबि आँखों में आयी थी |

किस तरह महँगाई में समझदारी से
जीवन जीने की कला सिखायी थी |

दूसरों की खुशियों को पूरा करने में
मैंने अपनी खुशियों की याद बिसरायी थी |

सोचा था वक्त आने पर अपने लिए जीऊँगा
और अपने सपनों से भी मिलूँगा |

वक्त ने भी मुझको दगा दे दिया
असमय मौत ने श्मशान पहुँचा दिया |

कंधों पर लोगों के मैं सो रहा था
और अधूरे सपनों के लिये रो रहा था |

सोचा था फुरसत के लम्हों में खुद के लिये जीऊँगा
और बचपन के यारों से मिलूँगा |

पुछूँगा अपने पहले प्यार से
क्यों दिया उत्तर उसने ऐसा
मेरे प्रेम-पत्र को फाड़कर |

जिस जीवन साथी ने दिया मेरा साथ
उसकी भी पूरी नहीं कर सका आस |

किया था वादा तीरथ-धाम घूमाने का
ज्यादा नहीं बस सोने का हार दिलाने का

समय ने मुझको यह पाठ सिखाया
मरने के बाद ही, पर यह ज्ञान आया |

दूसरों के साथ खुद के लिये भी जियो
और अपने सपनों से भी मिलो |

न मानोगे कहना मेरा
तो पड़ेगा मेरी तरह पछताना |

क्योंकि जीवन तो मिला पर जीना बाकि था
अभी तन ही नाचा मन मोर बाकि था |
 
3 वर्ष पहले
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