अभी तो तन ही नाचा, मन मोर बाकि था
नई उल्लास नया सबेरा नया जीवन था
शून्य से यौवन तक का सफर खुशियो का अफसाना था |
इन्ही क्षणों मे कुछ कर गुजरने का जज़्बा था
और सपनों को मुट्ठी में भरने का ईरादा था
औरों की नसीहत ना सुनना, मन का राजा था |
हो गयी जब उम्र जिम्मेदारियाँ उठाने की
तो बदल गयी जीवन की परिभाषा भी |
जब पिता बनकर फर्ज़ निभाया तो
पिताजी की छबि आँखों में आयी थी |
किस तरह महँगाई में समझदारी से
जीवन जीने की कला सिखायी थी |
दूसरों की खुशियों को पूरा करने में
मैंने अपनी खुशियों की याद बिसरायी थी |
सोचा था वक्त आने पर अपने लिए जीऊँगा
और अपने सपनों से भी मिलूँगा |
वक्त ने भी मुझको दगा दे दिया
असमय मौत ने श्मशान पहुँचा दिया |
कंधों पर लोगों के मैं सो रहा था
और अधूरे सपनों के लिये रो रहा था |
सोचा था फुरसत के लम्हों में खुद के लिये जीऊँगा
और बचपन के यारों से मिलूँगा |
पुछूँगा अपने पहले प्यार से
क्यों दिया उत्तर उसने ऐसा
मेरे प्रेम-पत्र को फाड़कर |
जिस जीवन साथी ने दिया मेरा साथ
उसकी भी पूरी नहीं कर सका आस |
किया था वादा तीरथ-धाम घूमाने का
ज्यादा नहीं बस सोने का हार दिलाने का
समय ने मुझको यह पाठ सिखाया
मरने के बाद ही, पर यह ज्ञान आया |
दूसरों के साथ खुद के लिये भी जियो
और अपने सपनों से भी मिलो |
न मानोगे कहना मेरा
तो पड़ेगा मेरी तरह पछताना |
क्योंकि जीवन तो मिला पर जीना बाकि था
अभी तन ही नाचा मन मोर बाकि था |
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