ऐ मोहब्बत तू अपनी दहलीज में रहा कर,
दर्दे दिल दिल में रख किसी से न कहा कर।
मत बांध खुद को किसी बंधन में बेकार के,
तू हवा है खुले हवा की रफ्तार में बहा कर।
तुझे क्या पता कि कैसे सपने सजाए जाते हैं,
क्यूं जाती हो सपनों के सारे महल ढहा कर।
मजाल क्या कि कोई उंगली उठा दे जमीर पर,
दामन के दाग धोकर तू आई है अभी नहाकर।
तुम तो शायद अभी अभी गई हो उस जगह,
मैं तो कब का वापस आ गया वहां जा कर।
क्या किया तूने सिपाही ने कभी सोचा ही नहीं,
क्यूं तुम्हारी हर बात रहती है हवा की हस्ताक्षर।
सिपाही यादव
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