ग़ज़ल
सोचता हूं के बचे दोस्त पुराने कितने
दूर होने के किए उसने बहाने कितने
मेरे गिरने पे लगी भीड़ देखने की बहुत
सोचता हूं कि मुझे आए बचाने कितने
बैठकर साथ कभी जिनके गुज़ारे लम्हे
लम्हे अब दूर के बाक़ी हैं बिताने कितने
हम तो बस थे जहां वैसे ही खड़े हैं अब तक
उसने बदले हैं नए रोज़ ठिकाने कितने
कहना मुश्किल जफा की बात बुरा लगता है
वरना मुझको पड़ेंगे किस्से सुनाने कितने