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यादों के झुरमुट से

Rajbala Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आज फुर्सत के दो पल पा कर,
        
                                                    
                            
खुद से नजर बचा कर,
निकली हूँ अतीत की सैर पर
हमेशा की तरह आज भी यहाँ,
बड़ी चहल पहल है
हँसते रोते लम्हों से सजा,
जाना पहचाना सा,
ये मेरा बीता हुआ कल है

यादों की इन गलियों से,
गुजरती चली जा रही हूँ
कुछ आंसुओं से भीगे लम्हे,
सामने आ खड़े हुये
तो कुछ भूली बिसरी बातों के मोती,
यूँ ही मिल गये राह में पड़े हुये
वहीँ यादों के एक झुरमुट से कुछ पल,
सहमे से झाँक रहे थे
मनो बीते लम्हों की भीड़ में,
अपनी अहमियत आंक रहे थे

हर इक पल का अपना इक किस्सा था
हर इक पल मेरे अतीत का हिस्सा था
मुझे हर लम्हा अजीज था
हर लम्हा मेरे दिल के करीब था
गुजरी हुयी बातों पर हैरान हूँ मैं
आने वाले कल से परेशान हूँ मैं
आने वाले और बीते हुये कल की कश्मकश में,
मेरा 'आज' बीता जा रहा है
मेरी जिंदगी का एक अनमोल लम्हा,
यूँ ही रीता जा रहा है

आज भविष्य की दहलीज पर खड़ी,
किसी असमंजस में पड़ी,
मैं क्या देखती जा रही हूँ
बजाय आगे बढ़ने के,
अतीत को ही कुरेदती जा रही हूँ
भुला कर इन बातों को,
नयी जिंदगी को आवाज दूँ
सपनों को अपने फिर से नयी परवाज़ दूँ
फिर से अपनी आँखों में, समेट लूँ आसमान को
क्षितिज पर हो कर खड़ी, फिर नाप लूँ इस जहान को
-डॉ राजबाला यादव




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