हे कविवर तुमने लिखी हमेशा
बचपन यौवन की कवितायेँ
क्यूँ वृद्धावस्था रही उपेक्षित
कारण मुझको बतलायें
बचपन है उगता सूरज तो मैं ढलता हुआ भानु सही
यौवन है हरा भरा उपवन मैं सूखा रेगिस्तान सही
सुन्दर वर्णन सूर्यास्त का करके खूब सुनाया
रेतीले धोरे बहुत लिखे फिर क्यूँ मुझको बिसराया
बचपन का कलरव वीणा नाद सा , मेरी आहट खटपट लगती
धंसे कपोल ना भाये कभी , यौवन की छवि मोहक लगती
यौवन को पूनम चाँद कहा , बचपन को मन भावन पावस सा
बस मेरा जीवन लगा तुम्हे उस काली घोर अमावस सा
झुकी कमान सा है शरीर , चलने फिरने की सामर्थ्य नहीं
है झुर्रियों भरा चेहरा , आँखे भी निस्तेज हुईं
कांपती जुबान , डगमग कदम , पर मेरे अंतर्मन में झांको
बचपन और यौवन दोनों मुझमे , मुझको कमतर ना आंको
बचपन का उल्लेख कभी क्या , है बिन दादी नानी के संभव
बचपन से यौवन तक देते , तुमको हम अपने अनुभव
माना कि गर्म खून है तुम में , मैं भी हूँ हिमगिर की ठंडी बयार सा
माना रण में तुम लेते लोहा , संग रहा पर मैं दुलार सा
अस्ताचल पर खड़ा हुआ मैं , पर मत पूछो मेरे जज्बे का
मैं हूँ ज्ञान का अथाह कोष , बुत हूँ साक्षात् तजुर्बे का
तन हो चाहे निशक्त मेरा , मन में है मेरे शक्ति अपार
मेरी सूझबूझ के आगे झुकता है सारा संसार
सांसारिक मोह से छूट चुका, मैं हूँ ऐसा बैरागी
उड़ने को तैयार है बैठा मेरे जीवन का पाखी
बनकर ढाल फिर भी खड़ा हुआ मैं बरगद का सा तरुवर
बिन मेरे काव्य अधूरा है सुनो मेरे प्यारे कविवर
-डॉ राजबाला यादव
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