विज्ञापन

तेरी सोन चिरैया माँ

Rajbala Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तेरी सोन चिरैया माँ,
        
                                                    
                            
मैं देस बिराने आयी हूँ
तेरा आँगन सूना कर के,
आंगन नया सजाने आयी हूँ
तेरे घर की मिटटी से,
नयी बगिया की महकाना है
घर अपना छोड़ के माँ,
अनजान डगर को जाना है
मेरी समझ के बाहर माँ,
सारी ये दुनियादारी है
घर वो पल में पराया हो जाता,
जहाँ आधी उमर गुजारी है
रिश्तों के कच्चे धागों को,
तेरी चौखट पे बाँध के आयी हूँ
बचपन की पक्की यादों को,
मैं संग अपने ले आयी हूँ

विधि की लेखनी ने लिख डाला,
किस्मत में अजब बिछोड़ा है
दिल से सांसों को जुदा किया,
काया ने प्राणो को छोड़ा है
जड़ों से अपनी, कटी पौध को,
किसी और धरा पर जमना है
साँसों को अपनी थामे ,
किसी और हवा में रमना है
ओढ़ जिसे तूने जीवन भर,
अपना धर्म संभाला है
औरों के ख्वाब सजाने को,
खुद को विस्मृत कर डाला है
तेरे बक्से से तेरी वही,
त्याग चुनरिया ले आयी हूँ
तेरा आँचल गीला कर के,
माँ सूखा मन ले आयी हूँ

गीला मन वहीँ पड़ा होगा,
तेरे पल्लू से बंधा कहीं
सपने सारे टंगे होंगे ,
तेरे घर की किसी खूँटी पे कहीं
गुड़ियों वाले कमरे में बंद,
अब भी बचपन हँसता होगा
तेरा पल्लू पकड़े माँ,
पीछे पीछे चलता होगा
पड़े होंगे कहीं वो नखरे,
किसी कोने में सारी शैतानी
अल्हड़पन, बचपन, नादानी,
अपने मन की मनमानी
वो खेल खिलोने, सपन सलोने,
छोड़ सभी वहां आयी हूँ
उन अंजलि भर चावल के संग,
तेरी देहरी पर रख आयी हूँ

कितनी भी खुशनुमा हो दुनिया,
तेरी गोद से अच्छी नहीं है माँ
प्यार कितना भी मिले यहाँ,
तेरे प्यार से सच्चा नहीं है माँ
उलझे बालों को देख भला,
प्यार से कौन संवारेगा
अब पहली रोटी सिकते ही,
खाने को कौन पुकारेगा
जब नींद न हो आँखों में मेरे,
कौन हाथ माँ सिर पर फेरे
छूट गए सब लाड घनेरे,
कहने को यहाँ सब हैं मेरे
पर अपनों की जब महफ़िल लगती,
अक्सर हो जाती परायी हूँ
तेरी आँखों के वो आंसू माँ,
आज समझ मैं पायी हूँ

आँचल की शीतल छाँव नहीं,
रिश्तों की तपन कुछ ज्यादा है
मिश्री से मीठे बोल कहाँ,
शब्दों की चुभन कुछ ज्यादा है
मौनी मन को पढ़ने वाली,
तेरी आँखें कहाँ से लाऊँ माँ
तू संग नहीं है यहाँ मेरे,
किसे अपना दर्द बताऊँ माँ
चोट लगे जो कभी मन पर,
इस दुनिया में चाहे अनचाहे
बोल कहाँ से लाऊँ माँ,
मैं तेरी ममता के भीगे फाहे
लक्ष्मी कहलाने वाली मैं,
क्या भाग लिखा के लायी हूँ
वो घर भी बेगाना हुआ,
इस घर ने भी न अपनायी हूँ

- डॉ राजबाला यादव


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
7 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

RATAN KUMAR

613 कविताएं

View Profile

Rajiv Tyagi

423 कविताएं

View Profile