नारी शक्ति का बखान, कर सारी दुनिया हारी
नारी के इर्द गिर्द ही रहती , सृष्टि की रचना सारी
बचा शेष है क्या लिखने को, क्या लेखन क्या कविता
सोचो क्या हो कल, गर उल्टी बह जाये सुरसरिता
हैं अमूल्य धरोहर दोनों या नर हो या नारी
जीवन की कश्ती खेने की दोनों की जिम्मेदारी
करे धरा आव्हान, सुनो आधुनिक नारी
नये समय का सृजन करो तुम, बन नवयुग निर्माण प्रभारी
ममता, प्रेम, करुणा, सेवाभाव, समर्पण
स्वाभिमान न रक्षित हो तो बंद करो ये तर्पण
नहीं चाहिये सतयुग की लक्ष्मी और गायत्री
नहीं चाहिये त्रेतायुग की सीता और सावित्री
मर्यादा पुरुषोत्तम राम नहीं नर
तो क्यों हों सिया सी नारी
हों सजग, सफल, समृद्ध, न कि दुखियारी बेचारी
आत्मरक्षा के लिए, कर में त्रिशूल उठाले
सीता से बन जा सान्वी, कुदृष्टि न रावण डाले
अष्टभुजा दुर्गा बनने की कर लो अब तैयारी
एक हाथ में सजे चूड़ियां, दूजे हाथ कटारी
एक हाथ वात्सल्य सम्भालो, दूजे से दुनियादारी
जननी, करनी, गृहणी, सबला, सुगुणा, सुकुमारी
विदुषी, प्रेयसी, श्रेयसी, प्रचंड, प्रखर तुम नारी
कलुषित दया का पात्र नहीं, हो समता की अधिकारी
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