मैं सोने का महल तो नहीं बना पाऊँगा,
पर तेरे नाम की एक रौशनी घर में जलाऊँगा।
तुम्हें राजरानी बनने का ख्वाब नहीं दिखाऊँगा,
पर रानी की तरह इज्ज़त दिल से करूँगा।
मैं बहुत कुछ नहीं कहूँगा, बस करके दिखाऊँगा,
तेरे हर ग़म को अपना बनाकर, तुझे हल्का कर जाऊँगा।
भूख लगे तो अपने हिस्से की रोटी खिला दूँगा,
अगर प्यास लगे तो मैं खुद ही अर्णव बना जाऊंगा !
भीड़ में तेरा नाम पुकारकर शर्मिंदा न करूँगा,
पर अकेले में तेरी हर बात खुदा की तरह सुनूँगा।
मैं चाँद-तारे तोड़ने का हुनर नहीं रखता,
पर चाँदनी रात में तेरा हाथ थामे रखता रहूँगा।
मैं बहुत कुछ नहीं, पर इतना तो कर जाऊँगा,
तेरे बिना अधूरा था, तेरे साथ पूरा हो जाऊँगा।
-अर्णव......