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अपनों की मुफलिसी

Rajat Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ठंड बहुत है सुबह इस रजाई में
        
                                                    
                            
शायद छत पर थोड़ी धूप नजर आये
ठिठक गए है मुफलिसी के वक्त हमारे
और वो कहते है ये वक्त कहीं गुजर ना जाए।

नजर ढूंढ़ती फिरती है कंधो पर
ऐतबार करने वाला कोई चेहरा नज़र आए
खौफ आज भी वही है कि किसी की नजर ना लगे
और अपनो के टोने टोटके बदल जाए।

समय की फांस ने ऐसा बांधा है हमे
जलकर भी रस्सी ऐठन ना जाए
दुआओ की रहमो करम पर चल रही है ज़िन्दगी
दवा लेकर सोचते है मर्ज पता चल जाए।

दिल दागदार कर बैठा उनकी यादों को,
कहीं कुछ हो जिससे यादों से उतर जाए
घाव अब भी हरे है डर है कहीं
उतरते हुए फिर कहीं कुरद न जाए।

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।

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8 वर्ष पहले
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kamlesh ranjan

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