ठंड बहुत है सुबह इस रजाई में
शायद छत पर थोड़ी धूप नजर आये
ठिठक गए है मुफलिसी के वक्त हमारे
और वो कहते है ये वक्त कहीं गुजर ना जाए।
नजर ढूंढ़ती फिरती है कंधो पर
ऐतबार करने वाला कोई चेहरा नज़र आए
खौफ आज भी वही है कि किसी की नजर ना लगे
और अपनो के टोने टोटके बदल जाए।
समय की फांस ने ऐसा बांधा है हमे
जलकर भी रस्सी ऐठन ना जाए
दुआओ की रहमो करम पर चल रही है ज़िन्दगी
दवा लेकर सोचते है मर्ज पता चल जाए।
दिल दागदार कर बैठा उनकी यादों को,
कहीं कुछ हो जिससे यादों से उतर जाए
घाव अब भी हरे है डर है कहीं
उतरते हुए फिर कहीं कुरद न जाए।
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