वो किताब जला दो
जला दो वो किताब,
जिस पर लिखा है—
“अच्छे के साथ अच्छा होता है।”
आज मैंने देखा है,
बुरे के साथ अच्छा होते हुए,
और अच्छे के साथ बुरा होते हुए।
सच की राह पर चलने वाला
अक्सर अकेला रह जाता है,
और झूठ का सहारा लेने वाला
भीड़ में सम्मान पाता है।
कर्मों का हिसाब होता है—
ये बात भी सुनी थी मैंने,
मगर आज की दुनिया में
हिसाब को बदलते देखा है मैंने।
फिर भी उस किताब को
पूरी तरह सच मानना छोड़ नहीं पाऊँगी,
क्योंकि दुनिया चाहे जो करे,
मैं अपनी अच्छाई नहीं जलाऊँगी।
किताब जला दूँगी शायद,
पर अपने संस्कार नहीं,
दुनिया बदल जाए चाहे,
मैं अपने भीतर की इंसानियत नहीं बदलूँगी।
-रजनी