प्रेम में इतना अंतर
कोई स्त्री नहीं कहती—
“मुझे पुरुष का चरित्र देखना है,”
लेकिन हर पुरुष कहता है—
“मुझे स्त्री का चरित्र समझना है।”
कितना अजीब है प्रेम का यह संसार,
जहाँ स्त्री से हर पल माँगा जाता है विश्वास,
और पुरुष के हर सवाल को
मिल जाता है अधिकार का नाम।
पति-पत्नी से कभी पूछकर देखना—
“तुम्हारे लिए परिवार पहले है
या तुम्हारी पत्नी?”
पुरुष शायद कहेगा—
“मेरा परिवार पहले है,
पत्नी उसके बाद।”
लेकिन पत्नी से पूछना,
तो वह अपनी पूरी दुनिया
पति के नाम कर देगी।
उसके लिए पति
न पहले है, न आख़िर में,
वह तो उसकी पूरी दुनिया है,
उसकी हर साँस के ज़िक्र में।
एक पुरुष के प्रेम में
अक्सर परिवार की प्राथमिकता होती है,
और एक स्त्री के प्रेम में
अक्सर पूरी ज़िंदगी होती है।
यही तो अंतर है
एक पुरुष और स्त्री के प्रेम में—
एक अपने रिश्तों को बाँटकर जीता है,
दूसरी अपना सब कुछ
एक रिश्ते में समेट लेती है।
शायद इसलिए स्त्री का प्रेम
सिर्फ़ एक रिश्ता नहीं होता,
वह उसके लिए
उसकी पूरी दुनिया होता है।
-रजनी