प्रेम के बाद की आध्यात्मिकता
प्रेम में तिरस्कृत स्त्रियाँ
अचानक आध्यात्मिक नहीं होतीं,
वे बस एक दिन थक जाती हैं—
किसी की राह देखते-देखते।
वे उस दरवाज़े को
आख़िरी बार देखती हैं,
जिस पर उन्होंने
कितनी ही रातें गुज़ारी थीं—
एक हँसी की उम्मीद में,
एक आवाज़ की आस में,
एक नाम सुनने के इंतज़ार में।
फिर चुपचाप
उसे बंद कर देती हैं—
बाहर से नहीं,
अपने भीतर से।
और यहीं से
लोग उन्हें बदलता हुआ देखते हैं।
कौन समझाए उन्हें—
वे ईश्वर के करीब नहीं गईं,
वे तो पहली बार
अपने बहुत करीब चली गई हैं।
अब वे शाम को
दूसरों को नहीं,
खुद को देखती हैं।
दूसरों की आवाज़ नहीं,
अपनी आवाज़ सुनती हैं।
और अपनी ही कहानी को
एक नए अर्थ में पढ़ती हैं।
जिसे तुम प्रेम कहती रहीं,
क्या वह सचमुच प्रेम था?
अब उन्हें समझ आता है—
प्रेम किसी दूसरे में नहीं होता,
वह हमारे भीतर जन्म लेता है
और कभी-कभी जाते-जाते
हमारा ही एक हिस्सा
अपने साथ ले जाता है।
उसी खाली जगह में
हम एक खिड़की बनाते हैं—
जहाँ से पहली बार
अपने भीतर का आकाश दिखाई देता है।
लोग उसे आध्यात्मिकता कहते हैं,
पर वह आध्यात्मिकता नहीं होती—
वह अपने ही मलबे में
अपने लिए
एक छोटी-सी जगह बनाने की कला होती है।
और शायद
यही प्रेम के बाद
अपने आप तक लौटने की
सबसे कठिन यात्रा है।
— राजनी