पत्थर पर कुछ नहीं उगता
किसी दूसरे का दिल
कैसे बदल दोगे तुम,
जो ख़ुद बदलना नहीं चाहता,
उसे कितना बदलोगे तुम?
अगर पत्थर पर कुछ उग नहीं रहा,
तो लाख कोशिशें कर लो,
कितना भी सींच लो उसे,
कितने भी आँसू बहा लो,
पत्थर पर पौधा नहीं उगा सकते तुम।
कुछ रिश्ते भी पत्थर जैसे होते हैं,
जहाँ प्रेम तो होता है,
मगर प्रेम का एहसास नहीं होता,
जहाँ तुम अपना सब कुछ लुटा दो,
फिर भी तुम्हारे त्याग का
कोई आभास नहीं होता।
तुम शब्दों से समझाते रह जाओ,
वो ख़ामोशी से ठुकराता रहेगा,
तुम हर बार उसे अपना मानोगे,
वो हर बार तुम्हें पराया बताता रहेगा।
तुम सोचोगे, एक दिन समझेगा,
एक दिन तुम्हारा दर्द पढ़ेगा,
एक दिन तुम्हारी आँखों में देखकर
तुम्हारे मन की बात समझेगा।
मगर याद रखना,
हर बीज में अंकुरण नहीं होता,
हर दिल में प्रेम नहीं होता,
हर इंसान के भीतर संवेदना नहीं होती,
और हर कोशिश का परिणाम
मनचाहा नहीं होता।
किसी को बदलने की ज़िद में
ख़ुद को मत बदल देना,
किसी पत्थर को फूल बनाने में
अपना अस्तित्व मत गँवा देना।
क्योंकि प्रेम का अर्थ
किसी को जीतना नहीं होता,
और किसी रिश्ते को बचाने का अर्थ
ख़ुद को हर दिन खोना नहीं होता।
जब लाख कोशिशों के बाद भी
तुम्हारी बात उस तक नहीं पहुँचती,
तो अपनी कोशिशों को दोष मत देना,
हर ज़मीन पर हरियाली नहीं खिलती,
हर दिल में इंसानियत नहीं मिलती।
कुछ पत्थरों को पत्थर ही रहने दो,
उनसे हरियाली की उम्मीद छोड़ दो,
जो तुम्हारे प्रेम को समझ न सके,
उसके पीछे ख़ुद को खोना छोड़ दो।
क्योंकि पत्थर को सींचते-सींचते
अगर तुम ही सूख गए,
तो उस पत्थर का क्या बदला,
बस तुम्हारे जीवन के रंग ही खो गए।
— रजनी