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मुद्दे से भागना

Rajani Shakyawar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मुद्दे से भागना
        
                                                    
                            

मेरा साथी फ़र्ज़ी समस्याएँ गिनाता है,
ताकि असली समस्या सामने न आए,
मैं जब मुद्दे की बात करती हूँ,
वह छोटी-छोटी बातों को मुद्दा बनाए।

बात जहाँ सच तक पहुँचने लगे,
वहाँ वह रास्ता बदल देता है,
जिस सवाल का जवाब देना हो,
उससे बचने को नया सवाल कर देता है।

उसे शिकायतें बहुत याद रहती हैं,
बस मेरी तकलीफ़ याद नहीं रहती,
बहस में जीतने की कोशिश रहती है,
मगर रिश्ते को समझने की चाह नहीं रहती।

मैं तुच्छ बातों पर लड़ना नहीं चाहती,
मैं तो बस असली बात सुलझाना चाहती हूँ,
मगर वह हर बार मुद्दे से भागता है,
और मैं हर बार सच तक पहुँचना चाहती हूँ।

कब तक यूँ ही सवाल बदलेंगे?
कब तक बातों को भटकाया जाएगा?
जिस दिन असली मुद्दे पर बात होगी,
शायद उसी दिन रिश्ता बचाया जाएगा।
-रजनी
2 घंटे पहले
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