मूँछ और चोटी
एक घर में पति-पत्नी के रूप में
दो इंसान नहीं रहते,
वहाँ एक मूँछ का किरदार निभाता है,
दूसरा चोटी बनकर रहता है।
एक के लिए अधिकार तय हैं,
दूसरे के लिए संस्कार,
एक के लिए हुक्म चलाना सहज,
दूसरे के लिए सहना ही व्यवहार।
कोई पति होकर भी
इंसान बनकर नहीं जी रहा,
कोई पत्नी होकर भी
अपने अस्तित्व से नहीं मिल रहा।
बस सदियों से दिए गए किरदार हैं—
मूँछ और चोटी के,
और इन्हीं किरदारों को निभाते-निभाते
दोनों भूल गए
कि वे पहले इंसान हैं।
यही तो हमारे समाज का दुर्भाग्य है—
घर तो बनते हैं,
पर उनमें इंसान नहीं रहते,
रिश्ते तो बनते हैं,
पर बराबरी के साथ नहीं जीते।
मूँछ भी उतरे, चोटी भी खुले,
तभी शायद घर में दो इंसान मिलेंगे।
— रजनी