आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मूँछ और चोटी

                
                                                         
                            मूँछ और चोटी
                                                                 
                            

एक घर में पति-पत्नी के रूप में
दो इंसान नहीं रहते,
वहाँ एक मूँछ का किरदार निभाता है,
दूसरा चोटी बनकर रहता है।

एक के लिए अधिकार तय हैं,
दूसरे के लिए संस्कार,
एक के लिए हुक्म चलाना सहज,
दूसरे के लिए सहना ही व्यवहार।

कोई पति होकर भी
इंसान बनकर नहीं जी रहा,
कोई पत्नी होकर भी
अपने अस्तित्व से नहीं मिल रहा।

बस सदियों से दिए गए किरदार हैं—
मूँछ और चोटी के,
और इन्हीं किरदारों को निभाते-निभाते
दोनों भूल गए
कि वे पहले इंसान हैं।

यही तो हमारे समाज का दुर्भाग्य है—
घर तो बनते हैं,
पर उनमें इंसान नहीं रहते,
रिश्ते तो बनते हैं,
पर बराबरी के साथ नहीं जीते।

मूँछ भी उतरे, चोटी भी खुले,
तभी शायद घर में दो इंसान मिलेंगे।
— रजनी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
11 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर