मोहब्बत और महत्वाकांक्षा
यदि प्रेम हासिल हो जाता,
तो महत्वाकांक्षा न होती,
दिल को पाने की चाह होती,
तो दुनिया जीतने की प्यास न होती।
जिसे हम अपना बनाना चाहते थे,
वही अगर अपना हो जाता,
तो शायद
खुद को साबित करने का जुनून भी
कहीं खो जाता।
अधूरी मोहब्बत ने ही
ख्वाबों को बड़ा किया,
दर्द ने ही
हौसलों को खड़ा किया।
जिसे पाने की चाह में
हमने खुद को खोया,
उसी ने शायद
हमें खुद से मिलाया।
कभी-कभी
जो प्रेम हमें नहीं मिलता,
वही हमारी महत्वाकांक्षा बन जाता है—
और इंसान
किसी को पाने से नहीं,
कुछ खो जाने के बाद
सबसे ऊँचा उठता है।
-रजनी