मजबूर भी, मजबूत भी
कितनी हृदयविदारक होगी वह पीड़ा,
जब एक साथ
मजबूर भी होना पड़े
और मजबूत भी।
जब आँखें कह रही हों—
“अब मुझसे और नहीं होता,”
मगर हालात कहें—
“अभी तुम्हें ही संभलना होगा।”
शब्दों में अपना दर्द कहने के बाद भी
कोई संवेदना समझने वाला न मिले,
कोई यह पूछने वाला न हो—
“तुम सच में कैसी हो?”
तब इंसान रोता नहीं,
बस चुप होना सीख जाता है,
अपने ही आँसुओं को पोंछकर
खुद को फिर से खड़ा करता है।
और सबसे दर्दनाक बात यह होती है—
कि दुनिया उसे मजबूत समझती रहती है,
जबकि भीतर से वह
हर दिन थोड़ा-थोड़ा टूट रही होती है।
— रजनी