आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मजबूर भी, मजबूत भी

                
                                                         
                            मजबूर भी, मजबूत भी
                                                                 
                            

कितनी हृदयविदारक होगी वह पीड़ा,
जब एक साथ
मजबूर भी होना पड़े
और मजबूत भी।

जब आँखें कह रही हों—
“अब मुझसे और नहीं होता,”
मगर हालात कहें—
“अभी तुम्हें ही संभलना होगा।”

शब्दों में अपना दर्द कहने के बाद भी
कोई संवेदना समझने वाला न मिले,
कोई यह पूछने वाला न हो—
“तुम सच में कैसी हो?”

तब इंसान रोता नहीं,
बस चुप होना सीख जाता है,
अपने ही आँसुओं को पोंछकर
खुद को फिर से खड़ा करता है।

और सबसे दर्दनाक बात यह होती है—
कि दुनिया उसे मजबूत समझती रहती है,
जबकि भीतर से वह
हर दिन थोड़ा-थोड़ा टूट रही होती है।
— रजनी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर