मैं तो कब का खो गया
परिस्थितियों ने हमसे
हमारा पुराना रूप छीन लिया,
वक्त ने धीरे-धीरे
हमसे हमारा ही रंग छीन लिया।
अब आईने में चेहरा तो वही है,
बस आँखों में वह बात नहीं,
हँसी तो होंठों पर आती है,
मगर पहले जैसी बात नहीं।
लोग आज भी उसी नाम से पुकारते हैं,
जिस नाम से कभी हम जिया करते थे,
मगर उन्हें क्या पता—
वह इंसान तो कब का बदल चुका है।
कुछ रिश्ते, कुछ मजबूरियाँ,
कुछ अधूरे सपने साथ ले गए,
और हम अपने ही भीतर से
खुद को कहीं दूर छोड़ आए।
अब बस नाम रह गया है मेरा,
वह पुराना “मैं” कहाँ है—
वह तो परिस्थितियों की भीड़ में
कब का खो गया।
— रजनी