जो है ही नहीं
दुनिया का सबसे बड़ा कष्ट
शायद यही होता है,
किसी ऐसी चीज़ की रक्षा करना,
जिसका अस्तित्व ही नहीं होता है।
उम्र बीत जाती है पहरा देते,
उस विश्वास को बचाने में,
जो कभी था ही नहीं,
उन रिश्तों को निभाने में,
जिनमें अपनापन ही नहीं।
हम दीवारें खड़ी करते रहते हैं,
एक ऐसे घर को बचाने के लिए,
जिसकी नींव ही नहीं होती,
हम ख़ुद को मिटाते रहते हैं,
उस प्रेम को बचाने के लिए,
जिसमें प्रेम की कोई जगह ही नहीं होती।
कभी सम्मान बचाते हैं,
कभी रिश्ते, कभी अपना मान,
कभी दूसरों की नज़रों में
अच्छा बने रहने का अरमान।
और इसी कोशिश में भूल जाते हैं,
कि ख़ुद का भी अस्तित्व है,
जिन्हें अपना समझकर सब कुछ सौंपा,
उनसे ही ख़ुद को बचाना अब शेष है।
सबसे बड़ा दुःख खोना नहीं,
बल्कि उस भ्रम में जीते रहना है,
जिसे सच मानकर उम्र गुज़ार दी,
उसी झूठ की रखवाली करते रहना है।
कभी तो सच को स्वीकार करो,
हर भ्रम को तोड़ना पड़ता है,
जो है ही नहीं इस दुनिया में,
उसके लिए ख़ुद को क्यों खोना पड़ता है?
— रजनी