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जिस माँ ने अपने ही बच्चे को ठुकरा दिया

Rajani Shakyawar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जिस माँ ने अपने ही बच्चे को ठुकरा दिया
        
                                                    
                            

सुनाती हूँ एक ऐसे बच्चे की कहानी,
जिसकी माँ ने ही
उसके हिस्से में लिख दी
उम्रभर की वीरानी।

तीन बच्चे थे उस माँ के,
तीनों उसकी ही औलाद थे,
मगर पिता के गुजर जाने के बाद
ममता के तराजू में
दो ही बच्चे उसके खास थे।

दो को प्यार मिला,
दो को माँ का दुलार मिला,
दो के लिए धन-संपत्ति रखी,
दो के लिए घर-संसार मिला।

और तीसरा बच्चा?
वह तो सबसे सीधा था,
सबसे समझदार,
सबसे होनहार था,
फिर भी न जाने क्यों
माँ की ममता में
उसके लिए कोई अधिकार न था।

वह माँ के सामने रोया,
हाथ जोड़कर बोला—
“माँ, पिता भी चले गए,
अब तुम भी मुझे मत छोड़ो।
मैंने ऐसा क्या कर दिया
कि अपने ही घर से
मुझे बेदखल कर रही हो?”

मगर माँ ने उसकी एक न सुनी,
उसकी आँखों का पानी भी
माँ का दिल न पिघला सका।
वह बच्चा माँ को पुकारता रहा,
और माँ ने
उसकी पुकार को
अनसुना कर दिया।

जिस घर में उसने
बचपन बिताया था,
उसी घर से उसे
पराया कर दिया गया।
जिस माँ की गोद को
उसने अपना संसार माना था,
उसी माँ ने
उसके हिस्से का प्यार भी
छीन लिया।

सोचो, उस बच्चे पर
क्या बीती होगी,
जब पिता की छाया भी न रही
और माँ ने भी
ममता की छाया हटा ली।

भाई-बहनों को मिला
माँ का प्यार और अधिकार,
और उसके हिस्से आया
सिर्फ इंतज़ार और इंकार।

वह आज भी शायद
अपने दिल से पूछता होगा—
“माँ, मैं भी तो तुम्हारा ही बच्चा था,
फिर मेरे हिस्से में
इतना दर्द क्यों आया?”

माँ से मिला दर्द
दुनिया का सबसे गहरा दर्द होता है,
क्योंकि माँ के दिए घाव पर
कोई मरहम काम नहीं करता।

जिसे दुनिया ने
माँ की ममता का सबसे बड़ा रिश्ता कहा,
उसी रिश्ते ने
उस बच्चे को उम्रभर के लिए
अकेला कर दिया।

दो बच्चों को अपना कहकर
एक को पराया कर देना,
सिर्फ संपत्ति का बँटवारा नहीं,
एक बच्चे के दिल को
उम्रभर के लिए बाँट देना है।

कुछ बच्चे घर से बेदखल होते हैं,
मगर असल में
वे माँ के दिल से बेदखल होते हैं—
और यह दर्द
किसी कागज़ पर नहीं लिखा जाता,
बस पूरी उम्र
दिल में जिया जाता है।
-रजनी
एक महीने पहले
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