ज़िंदगी—हक़ीक़त या सपना
आपने ज़िंदगी जी ली—
किसी ने बीस वर्ष, किसी ने पचास वर्ष,
किसी ने पूरी उम्र हँसकर,
तो किसी ने आँसू बहाकर।
आपके साथ जो घटनाएँ घटीं—
अच्छी थीं या बुरी,
सम्मान मिला या अपमान,
सुख मिला या दर्द—
एक दिन सब पीछे छूट जाएगा।
फिर क्या फर्क पड़ेगा
कि जो कुछ हुआ, सच में हुआ था
या सिर्फ़ एक सपना था?
करोड़ों लोग आए,
करोड़ों लोग चले गए,
किसी की कहानी याद रही,
किसी का नाम भी नहीं रहा।
मृत्यु के उस अंतिम क्षण में
क्या फर्क पड़ेगा
कि आपकी कहानी हक़ीक़त थी
या महज़ एक सपना?
आख़िर ज़िंदगी भी तो
एक लंबा-सा ख़्वाब ही है—
आँख खुली तो सब ख़त्म,
और पीछे बस एक कहानी रह गई।
— रजनी