जीवनसाथी या सिर्फ़ एक जिम्मेदारी?
क्या करोगी ऐसे जीवनसाथी का,
जिसने कभी तुम्हारे सपने नहीं पूछे,
कभी यह जानने की कोशिश नहीं की
कि तुम्हें क्या पसंद है, क्या नहीं।
तुम रोईं तो उसने
कभी तुम्हें गले नहीं लगाया,
तुम अलग सोईं, अलग रहीं,
कभी कारण तक नहीं पूछा।
तुम्हारी आँखों में आँसू थे,
मगर उसकी नज़र तुम पर नहीं थी,
वह अपने मोबाइल रूपी घूँघट में
हर बार अपना चेहरा छिपाता रहा।
जहाँ न सम्मान हो,
न परवाह हो, न अपनापन,
बस एक स्वार्थ हो—
कि एक स्त्री घर में आई है,
जो बिना वेतन मेरी हर ज़रूरत पूरी करेगी।
ऐसा जीवनसाथी पाकर
स्त्री बाहर से घर बसाती रहती है,
और भीतर से
धीरे-धीरे खाली होती जाती है।
मायका दहेज देकर खाली हो गया,
तुम तन और मन देकर खाली हो जाओगी—
फिर भी अगर कोई पूछे,
“तुम्हें मिला क्या?”
तो शायद तुम्हारे पास
अपने आँसुओं के सिवा कुछ न बचे।
— रजनी