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इंसानियत ही धर्म है

Rajani Shakyawar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            इंसानियत ही धर्म है
        
                                                    
                            

दुनिया में जितने भी धर्म हैं,
हर एक खुद को सच्चा बताता है,
और अक्सर दूसरे धर्म को
अपने से नीचा समझ जाता है।

हर जाति दूसरी जाति को
कभी ऊँची, कभी नीची मानती है,
इंसान भी अपने अलावा
दूसरे इंसान को कमतर जानता है।

कोई उसे नीचा कहता है,
कोई पागल, कोई बेवकूफ,
अपने अहंकार की ऊँचाई में
भूल जाता है इंसानियत का रूप।

जब तक ये भेदभाव रहेगा,
मनुष्य कभी इंसान नहीं बन पाएगा,
धर्म, जाति और अहंकार के पीछे
इंसान ही इंसान से दूर होता जाएगा।

मैं उस धर्म को मानने से इनकार करती हूँ,
जिसमें इंसान से इंसान अलग हो जाए,
जहाँ दया से पहले भेदभाव आए,
और प्रेम से पहले अहंकार खड़ा हो जाए।

दया और दृष्टि रखना अनिवार्य है,
सिर्फ धर्म मानना काफी नहीं,
मानव होने के नाते मानवता रखना—
इससे बड़ा कोई धर्म नहीं।

इंसानियत ही मेरा धर्म है,
और भेदभाव से मेरा इनकार।

— रजनी
2 महीने पहले
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