हक़ कहाँ मिला
मेरे हिस्से में हक़ आया ही नहीं कभी,
हमेशा फ़र्ज़ ही निभाते रह गए।
दूसरों की खुशियों के लिए
अपने अरमान दबाते रह गए।
जिसे अपना समझा,
उसी के लिए खुद को भूलते गए,
रिश्तों की ज़िम्मेदारियों में
अपने हिस्से के सपने घोलते गए।
सबके लिए खड़े रहे उम्रभर,
मगर अपने लिए कोई खड़ा न हुआ,
हमने तो हर रिश्ता दिल से निभाया,
पर हमारा हक़ हमें कभी मिला न हुआ।
अब शिकायत भी किससे करें,
जब आदत ही सहने की बन गई,
फ़र्ज़ निभाते-निभाते
ज़िंदगी जाने कब ख़त्म हो गई।
— रजनी