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दीवारों से बातें करते-करते

Rajani Shakyawar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            दीवारों से बातें करते-करते
        
                                                    
                            

दीवारों से बातें करते-करते
कट गई मेरी ज़िंदगी,
साथ तो मिला मुझे किसी का,
बस अपनी कल्पनाओं में ही।

हक़ीक़त में तो अकेली थी,
अकेली ही चलती रही,
अकेले रहकर हँसना-बोलना भी
शायद कहीं भूल गई।

डर है, किसी दिन यूँ ही
बिल्कुल गुमसुम हो जाऊँगी,
होंठ रहेंगे, आवाज़ रहेगी,
पर शायद बोलना भूल जाऊँगी।

मिला तो मुझे सब कुछ—
दुनिया को दिखाने के लिए,
और अपनी ख़ुशी की तस्वीर
मन में सजाने के लिए।

मगर सच की दुनिया में
मैं अकेली थी, अकेली हूँ,
और शायद अकेली ही रहूँगी।
— रजनी
एक महीने पहले
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