बचपन से बाँटना सिखाइए
बच्चों को बचपन से
छोटी-छोटी चीज़ें बाँटना सिखाइए,
क्योंकि बाँटने की आदत ही
बड़े होकर इंसानियत निभाती है।
जो बचपन में
भाई-बहन का हिस्सा छीनना सीख जाता है,
वही बड़ा होकर
ज़मीन-जायदाद में भी
लूट-खसोट कर जाता है।
किसी का हक़ दबा लेता है,
किसी का हिस्सा खा जाता है,
और कभी-कभी तो
एक ही भाई या एक ही बहन
पूरे परिवार की दौलत हड़प जाता है।
मगर दोष सिर्फ़ बच्चों का नहीं,
कभी-कभी माँ-बाप भी
अपने ही बच्चों में भेदभाव करते हैं,
किसी एक पर सारा प्यार लुटाते हैं,
सारी दौलत उसी के नाम करते हैं,
और दूसरे को
प्यार से भी बेदखल कर देते हैं।
ऐसे माता-पिता से
बस एक सवाल है—
जब बराबर जन्म दिया था,
तो बराबर अधिकार क्यों नहीं दिया?
बच्चों को जन्म देना ही
माता-पिता होने की पहचान नहीं,
हर बच्चे के साथ
न्याय करना भी ज़रूरी है।
अगर किसी एक को सब देना है
और दूसरे से उसका हक़ छीनना है,
अगर बच्चों में भेदभाव ही करना है,
तो फिर किसी मासूम को
इस दुनिया में लाकर
उसकी ज़िंदगी को संघर्ष क्यों बनाना?
याद रखिए,
आपकी एकतरफ़ा मोहब्बत
किसी बच्चे के भीतर
उम्रभर का दर्द छोड़ सकती है।
बच्चे आपके दिए हुए धन से नहीं,
आपके दिए हुए संस्कारों से बड़े होते हैं।
अगर बाँटना नहीं सिखा सकते,
अगर बराबरी नहीं कर सकते,
तो कम-से-कम
किसी का हक़ मत छीनिए।
बात कड़वी है,
मगर सच है—
जिस घर में बच्चों को
बराबरी का प्यार नहीं मिलता,
वहाँ दौलत तो बाँटी जा सकती है,
लेकिन रिश्ते
टुकड़ों में बिखर जाते हैं।
और जिस माँ-बाप में
न्याय नाम की चीज़ ही नहीं,
वे अपने बच्चों को
आख़िर कौन-सा संस्कार देंगे?
बच्चे पैदा करना आसान है,
मगर अच्छा माँ-बाप बनना
बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है।
— रजनी